रुद्रपुर। तराई के जंगलों में इन दिनों “प्लॉट सफाई” और “जलौनी व सौकते की लकड़ी” की आड़ में बड़े पैमाने पर लकड़ी निकासी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक पिछले लगभग दस दिनों में भाखड़ा रेंज और हल्द्वानी रेंज से दर्जनों ट्रैक्टर-ट्रालियां लकड़ी से लदी हुई उत्तराखंड से निकलकर उत्तर प्रदेश के स्वार क्षेत्र तक पहुंचने की बात सामने आ रही है।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि रात के अंधेरे में लकड़ी से भरी ट्रॉलियों का यह सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन अब तक इस पूरे मामले में विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इन ट्रॉलियों को जंगल से निकालने का आदेश किसने दिया?
पत्थर चट्टा चैक पोस्ट से निकली 7 ट्रॉलियां!
सूत्रों के अनुसार दिनांक 28 फरवरी 2026 को पत्थर चट्टा वन चैक पोस्ट के सामने से शाम लगभग 7:30 बजे से 9:00 बजे के बीच लकड़ी से लदी करीब 7 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां गुजरती देखी गईं।
अब बड़ा सवाल यह है कि ये ट्रॉलियां किस रेंज से निकलीं, किस प्लॉट संख्या से लकड़ी निकाली गई और किस ठेकेदार को प्लॉट सफाई का ठेका दिया गया था।
जाफरपुर में पकड़ी गई लकड़ी की ट्रॉलियां
8 मार्च 2026 को लगभग रात 10 बजे जाफरपुर क्षेत्र में लकड़ी से लदी तीन ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पकड़ी जाने की भी चर्चा है।
क्या इन ट्रॉलियों को जंगल से बाहर ले जाने की आधिकारिक अनुमति थी या नहीं?
उत्तर प्रदेश के लकड़ी चोरों पर मेहरबानी क्यों?
तराई क्षेत्र में एक और चर्चा तेजी से फैल रही है कि उत्तर प्रदेश के लकड़ी तस्कर उत्तराखंड के जंगलों में कैसे सक्रिय हो गए।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि विभाग की मिलीभगत न हो तो जंगल से एक ट्रॉली लकड़ी निकालना भी आसान नहीं होता। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या 70 प्रतिशत तक कमीशन की चर्चाओं के चलते स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों को दरकिनार कर बाहरी लोगों को काम दिया जा रहा है?
सबसे अमीर DFO और रेंजर कौन-कौन
इसी बीच तराई के वन प्रभागों में एक और सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है
सूत्रों के मुताबिक वन विभाग के कुछ अधिकारियों की संपत्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा जिन अधिकारियों पर है, उन्हीं पर अब अवैध कमाई और अकूत संपत्ति बनाने के आरोप लग रहे हैं।
बताया जा रहा है कि वानिकी कार्यों, जंगल सफाई, ठेके और लकड़ी निकासी के नाम पर करोड़ों रुपये के खेल की चर्चा विभाग के अंदर ही होने लगी है। सूत्रों का कहना है कि कुछ अधिकारी अपने चहेते ठेकेदारों को काम दिलाकर मोटा कमीशन लेते हैं, जिसके चलते कुछ ही वर्षों में उनकी संपत्तियों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है।
वन विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर इन मामलों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं और तराई के जंगलों में चल रहे कथित भ्रष्टाचार के नेटवर्क का भी खुलासा हो सकता है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार और वन विभाग इन गंभीर सवालों पर क्या कार्रवाई करते हैं और क्या सच में इन अधिकारियों की संपत्तियों की जांच होगी।
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