रुद्रपुर। तराई केंद्रीय वन प्रभाग की पीपल पड़ाव रेंज से प्लॉट सफाई की आड़ में लकड़ी निकासी का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। मामला सिर्फ लकड़ी तस्करी का नहीं, बल्कि विभागीय कमजोरी, लापरवाही या फिर कथित मिलीभगत की बू दे रहा है।
सूत्रों के मुताबिक पीपल पड़ाव रेंज क्षेत्र से प्लॉट सफाई के नाम पर लकड़ी से भरे तीन पिकअप वाहन हरिपुरा डैम होते हुए मसीत की ओर पहुंचे। इसकी भनक पर्यावरण प्रेमियों को लगी तो उन्होंने तत्काल वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलते ही रुद्रपुर रेंज की टीम हरकत में आई और मसीत मोड़ के पास पुल पर तीनों वाहनों को रोकने में सफलता भी हासिल कर ली।
लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
बताया जा रहा है कि वन विभाग की टीम ने लकड़ी से भरी पिकअप गाड़ियों को करीब 2 से 3 घंटे तक रोके रखा, यानी वाहन, लकड़ी और पूरा मामला विभाग की पकड़ में था। इसके बावजूद हैरानी की बात यह रही कि तीनों में से केवल एक पिकअप को ही कब्जे में लिया जा सका, जबकि दो लकड़ी से भरे वाहन वन विभाग की मौजूदगी के बावजूद निकल गए।
👉 अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ।
👉 जब वाहन मौके पर पकड़े गए थे…
👉 जब टीम उन्हें घंटों रोके रही…
👉 जब लकड़ी से भरे वाहन विभाग की निगरानी में थे…
👉 तो फिर दो पिकअप कैसे छूट गईं…
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वन विभाग की टीम वन तस्करों के आगे बेबस थी? क्या मौके पर मौजूद कर्मचारियों के पास कार्रवाई की इच्छाशक्ति नहीं थी? या फिर मामला सिर्फ कमजोरी का नहीं, बल्कि किसी बड़े संरक्षण और अंदरखाने की सेटिंग का है?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब वाहन मौके पर पकड़े गए, उन्हें रोका गया, लकड़ी बरामद हुई और घंटों तक कार्रवाई चलती रही, तो फिर FIR अज्ञात लोगों के खिलाफ ही क्यों दर्ज की गई?
👉 प्लॉट सफाई का काम किस ठेकेदार के जिम्मे था?
👉 लकड़ी किस प्लॉट से निकली?
👉 किसके आदेश पर निकासी हो रही थी?
👉 और सबसे अहम — ठेकेदार का नाम FIR में क्यों नहीं है?
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि जंगलों में इन दिनों प्लॉट सफाई के नाम पर ठेकेदारों का ही “पुष्पराज” चल रहा है। बिना संरक्षण के जंगल से लकड़ी निकलना आसान नहीं होता। ऐसे में सवाल विभाग पर ही लौटकर आता है कि क्या ठेकेदार और जिम्मेदार अफसरों के बीच सब कुछ पहले से सेट था?
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मामले में FIR दर्ज कर दी गई है। लेकिन विभाग की यही दलील अब लोगों के गले नहीं उतर रही। क्योंकि यदि कार्रवाई सच में गंभीर होती, तो अज्ञात नहीं, नामजद मुकदमा होता। जिन वाहनों को रोका गया, जिनके जरिए लकड़ी निकाली जा रही थी, जिनके पीछे प्लॉट सफाई का ठेका था — उन सबकी पहचान करना क्या विभाग के लिए इतना मुश्किल था?
यह घटना साफ संकेत दे रही है कि तराई के जंगलों में प्लॉट सफाई अब संरक्षण का काम कम और लकड़ी निकासी का खुला खेल ज्यादा बनती जा रही है। अगर वन विभाग मौके पर पकड़े गए वाहनों से भी सच्चाई बाहर नहीं ला पा रहा, तो फिर जंगल सुरक्षित किस भरोसे हैं?
अब देखना यह होगा कि विभाग इस मामले में सिर्फ कागजी FIR तक सीमित रहता है या फिर ठेकेदार, जिम्मेदार कर्मचारियों और पूरे नेटवर्क पर नामजद कार्रवाई कर सच सामने लाता है।
👉 जब लकड़ी से भरी पिकअप 2-3 घंटे तक विभाग की पकड़ में थीं, तो फिर ‘अज्ञात’ कौन है?
👉 और अगर अज्ञात है, तो फिर पकड़ा किसे गया था?











